bank merger- क्या merger से सुधर जाएगी, सरकारी बैंकों की हालत.?


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सरकार ने हाल ही में Bank Of Baroda, Vijaya bank तथा Dena Bank के विलय को सैद्धान्तिक मंजूरी प्रदान कर दी है, अब इस विलय के प्रस्ताव पर तीनों बैंको के बोर्ड में इस पर चर्चा होगी. और सभी बैंक के बोर्ड इस प्रस्ताव को हरी झण्डी दिखाने की औपचारिकता निभाएंगे. आपको बता दें इन तीनों बैंको के विलय से बनने वाला बैंक देश का तीसरा सबसे बड़ा बैंक होगा. जिसके पास 14.82 लाख करोड़ का बिज़नेस होगा. 
कितना कारगर होगा विलय.
दरअसल इस समय सभी सरकारी बैंको की NPA के बढ़ते बोझ से साँसे फूल रहीं हैं। सरकारी स्तर पर भी बैंको के डूबे हुए कर्ज को लेकर भारी चिंता है. बैंकों को इस स्थिति से निकालना सरकार के लिए मुसीबत बनता जा रहा है. मोदी सरकार में सरकारी बैंक इतिहास के अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहें हैं. SBI जैसा बाद बैंक पिछले तीन तिमाही से लगातार घाटे में है. आपको बता दें SBI अपने इतिहास में पहली बार घाटे में गया है. बैंको को NPA से होने वाले घाटे से उबारने के लिए सरकार कॉस्ट-कट के फार्मूले को अपनाने जा रही है. दरअसल सरकार का मानना है कि बैंको के विलय से उनकी ऑपरेशन की लागत कम हो जाएगी. और बड़ी बैंक ज्यादा जोखिम के लिए सक्षम होगी.
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क्या वास्तव में सरकार सही रास्ते पर है.?
सरकार के बैंको के विलय की नीति तात्कालिक स्तर पर कुछ राहत जरूर दे सकती है. लेकिन लम्बे समय में सरकार की यह नीति कारगर साबित होती नही दिख रही है. वर्तमान समय मे नए डिपॉजिट का 70% प्राइवेट बैंको के पास है. नए लोन का भी 80% हिस्सा आज प्राइवेट बैंको के पास ही है. जबकि नेटवर्क के मामले में प्राइवेट बैंक सरकारी बैंकों से बहुत पीछे हैं. फिर आखिर क्यों सरकारी बैंक प्राइवेट बैंको से इतना पिछड़ रहें हैं??



तबाही की वजह है, सरकारी हस्तक्षेप.
दरअसल जब से बैंको का राष्ट्रीयकरण हुआ है, तभी से सरकारी बैंकों में सरकारी हस्तक्षेप रहा है. वर्तमान सरकार के आने के बाद यह हस्तक्षेप हद से ज्यादा बढ़ गया. सरकार ने अपनी लोक-लुभावनी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए बैंको का हद से ज्यादा उपयोग किया. नतीजा यह हुआ कि बैंक अपने मूल काम डिपॉजिट और लोन को छोड़कर सरकारी एजेंट की तरह काम करने लगे। बैंक प्रबंधन का फोकस डिपाजिट और एडवांस के टारगेट से हटकर PMJBY, PMSBY, MUDRA Loan, PMJDY, AADHAR Centers, आदि के टारगेट हो गए. बैंको के प्रबंधन की योग्यता का आधार बैंको का बिज़नेस ना होकर, सरकारी योजनाओं में पूरे किए गए टारगेट हो गए. सरकारी बैंकों में सरकारी दखल इस हद तक बढ़ गया कि बैंक कर्मी जबरदस्त तनाव में आ गए. पहले से ही काम के अधिक बोझ और कम स्टाफ का दर्द झेल रहे है बैंक कर्मियों के लिए सरकारी दबाव के आगे बैंक का मूल बिज़नेस डिपाजिट-एडवांस-लोन-रिकवरी आदि पीछे छूट गया. 


सरकार की नीति है, बैंक कम हो लेकिन वर्ल्ड क्लास हों.
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वर्तमान सरकार की नीति रही है, की बैंक कम हों, लेकिन वर्ल्ड लेवल पर प्रतिस्पर्धी हों. बड़ी बैंक होने का यह फायदा है, की उसकी ऑपरेटिंग कॉस्ट कम हो जाती है, अपेक्षाकृत कम लोगों से ज्यादा काम लिया जा सकता है. लेकिन इसके अपने जोखिम भी हैं, अगर देश मे सिर्फ चार-पाँच बैंक ही हैं. और उनमें से कोई एक या दो डूब जाएं, तो देश की पूरी इकोनॉमी तबाह हो सकती है. इसका उदाहरण हम 2008 में देख चुकें हैं. जब अमेरिका की एक बैंक लेहमन ब्रदर्स के डुबने से पूरा अमेरिका भारी आर्थिक मंदी की चपेट में गया. और धीरे-2 अमेरिका की इस मंदी ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया. इस आर्थिक मंदी का असर उस समय भारत पर बहुत ज्यादा नही हुआ. क्योकि उस समय भारत के बैंक बहुत ही मज़बूत स्थिति में थे।

क्या है NPA बढ़ने की वजह..
भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के मद्देनजर नज़र हर सरकार वोट बैंक के लिए लोक-लुभावनी योजनाएं बनाती है. लोन-माफी जैसी चीजें लोगो को बैंको का कर्ज ना चुकाने के लिए प्रेरित करतीं हैं. लोगों में आर्थिक लापरवाही की ऐसी मंशा पनपने लगी है. जो किसी भी मज़बूत से मज़बूत बैंकिंग सिस्टम को तबाह कर सकती है. दूसरा कॉरपोरेट लोन के मामले में सरकारी हस्तक्षेप इतना ज्यादा है कि बैंक अधिकारी सिर्फ सिग्नेचर करने के अधिकारी हो जातें हैं। उसके बाद रिकवरी में भी बैंक अधिकारियों को कार्यवाही करने की आज़ादी नही होती. आप सरकार से इस बारे में कोई सवाल करेंगें. तो कोई भी सरकार इसे नकार देगी. लेकिन यह चीजें हमेशा से थी और आज भी हैं। जब तक आप अपने सरकारी  बैंकिंग-सेक्टर को आज़ाद नही करते. बैंको की हालत में सुधार संभव नहीं दिखता. 

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