नोटबन्दी करवाने वाले मोदी के अपने मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा, नोटबन्दी था गलत फैसला- हुआ देश के विकास को नुकसान- अरविंद सुब्रमण्यम

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नोटबन्दी करवाने वाले मोदी के अपने मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा, नोटबन्दी था गलत फैसला- हुआ देश के विकास को नुकसान- अरविंद सुब्रमण्यम

पूर्व RBI Governor रघुराम राजन के बाद अब मोदी सरकार में नोटबन्दी के समय मुख्य आर्थिक सलाहकार जैसे बड़े पद पर रहे देश के प्रमुख अर्थशास्त्री अरविंद सुब्रमण्यम ने भी नोटबन्दी को क्रुर फैसला बताया है। उन्होंने कहा कि नोटबन्दी की वजह से देश की इकोनॉमी को बहुत बड़ा झटका लगा था। जिससे देश की जो विकास दर 8% से ज्यादा होनी चाहिए थी। वो 6.8 प्रतिशत के निचले स्तर पर आ गई। अरविंद सुब्रमण्यम ने यह बातें अपनी किताब "ऑफ काउंसिल: द चैलेंजेज ऑफ द मोदी-जेटली इकॉनमी" में कहीं हैं। 
अरविंद सुब्रमण्यम देश के बड़े अर्थशास्त्री हैं, हाल ही उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दिया है। वो 2014 से जून 2018 तक मोदी सरकार के, "मुख्य आर्थिक सलाहकार" रहें हैं। जिस समय नोटबन्दी की गई, उस समय भी सुब्रमण्यम मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार थे। 

हुआ GDP ग्रोथ को नुकसान..

नोटबन्दी के वक्त मुख्यमंत्री आर्थिक सलाहकार जैसे प्रमुख पद पर रहे अरविंद सुब्रमण्यम ने अपनी किताब, "ऑफ काउंसिल: द चैलेंजेज ऑफ द मोदी-जेटली इकॉनमी" में कहा कि अचानक से 1000 और 500 के नोट जो कुल नोटों का 86 प्रतिशत से अधिक था, को बंद कर देने से तेज़ी से बढ़ती GDP को भारी नुकसान हुआ था। देश की जो GDP नोटबन्दी से पहले 8% की तेज गति से आगे बढ़ रही थी। वो नोटबन्दी की वजह से 6.8% पर आ गई। 
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सबसे बुरा असर असंगठित क्षेत्र पर.

अरविंद सुब्रमण्यम ने अपनी किताब में कहा, की नोटबन्दी का सबसे ज्यादा बुरा असर देश के असंगठित क्षेत्र पर हुआ। क्योकि इस क्षेत्र में 95% तक कैश में काम होता है। और अचानक से 86% करेंसी को बंद कर देने से यह क्षेत्र पैसे-पैसे को मोहताज हो गया। असंगठित क्षेत्र अभी भी नोटबन्दी की मार से बाहर नही निकल पाया है। नोटबन्दी की वजह से असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले बहुत से लोगों की नौकरियां चली गई. 



आधुनिक इतिहास में सबसे अनोखा फैसला

मोदी सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार ने अपनी किताब में नोटबन्दी को आधुनिक इतिहास का सबसे अनोखा फैसला बताया है। उन्होंने लिखा है, की आधुनिक इतिहास में नोटबन्दी जैसा एक भी उदहारण नही है। भारत एकमात्र देश है जिसने नोटबन्दी जैसा अनोखा फैसला लिया। आपको बता दें, भारत के बाद वेनेजुएला ने भी नोटबन्दी का फैसला लिया था। लेकिन वेनेजुएला की सरकार को नोटबन्दी का फैसला वापस लेना पड़ा था।

विपक्षी दलों ने सरकार को घेरा..
मोदी सरकार के अपने इतने बड़े अर्थशास्त्री के द्वारा नोटबन्दी की ऐसी आलोचना पर जहां मोदी सरकार बैकफुट पर है, वहीं विपक्षी दल एकबार फिर से सरकार पर हमलावर हो गए हैं। कांग्रेस सहित देश की सभी राजनैतिक पार्टियों ने नोटबन्दी का विरोध किया था। नोटबन्दी पर मोदी सरकार का साथ देने वाले एकमात्र नेता बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार थे। लेकिन बाद में उन्होंने भी नोटबन्दी के लिए अपने समर्थन से पल्ला झाड़ लिया था। और नोटबन्दी कि विफलता के लिए बैंक-कर्मियों को दोषी बता दिया था। 
अरविंद सुब्रमण्यम ने अपनी किताब में कहा है, की मोदी सरकार के पास नोटबन्दी करने की ठोस वजह नही थी। लेकिन फिर भी जल्दबाजी में नोटबन्दी कर दी गई। 

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हाल ही में रघुराम राजन ने भी नोटबन्दी को बताया था गलत फैसला

हाल ही में रघुराम राजन ने भी भारतीय अर्थव्यवस्था में मौजूदा संकट और बेरोजगारी की दर बढ़ने के लिए वस्तु एवं सेवा कर (GST) तथा नोटबन्दी को जिम्मेदार ठहराया था। उन्होंने यह बात बार्कले यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहीं थी। रघुराम राजन को दुनिया का बड़ा अर्थशास्त्री माना जाता है।  वो भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर भी रह चुके हैं। उनके पद छोड़ने की प्रमुख वजह वर्तमान मोदी सरकार के साथ उनके मतभेद को माना जाता है।




  रघुराम राजन ने कहा था कि नोटबन्दी और GST दो ऐसे कारण हैं, जिनकी वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था में गिरावट आई है। वर्तमान में भारत की अर्थव्यवस्था 7% की वृद्धि दर से आगे बढ़ रही है। जो देश मे बढ़ती बेरोजगारी के लिए नाकाफी है। उन्होंने कहा 2012 से  2016 तक भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया मे सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था थी। 2016 तक भारत एकदम सही रास्ते पर आगे बढ़ रहा था। फिर अचानक से नोटबन्दी और उसके बाद GST ने देश की अर्थव्यवस्था को पीछे धकेल दिया।

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