Bank of baroda, Vijaya bank and Dena Bank Merger-UFBU and AIBEA strike-अगले 7 दिनों में Merger से संबंधित सभी फॉर्मेलिटी पूरी होने की संभावना.


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RRBNEWS Desk:- Bank Of Baroda, Vijaya bank और Dena Bank के Merger को अंतिम रूप देने में जुटी सरकार. अगले 7 दिनों में Merger से संबंधित सभी फॉर्मेलिटी पूरी होने की संभावना..

बैंक यूनियंस के भारी विरोध के बावजूद सरकार Bank Of Baroda, Vijaya bank और Dena Bank के Merger अंतिम रूप देने की तैयारी में है. अगले 7 दिनों में Merger से संबंधित सभी फॉर्मेलिटी पूरी होने की संभावना है.
संसद का मौजूदा सत्र 8 जनवरी तक चलेगा. उससे पहले ही इन तीनों बैंकों के Merger से संबंधित संपूर्ण कार्यवाही पूरी होने की संभावना है. गौरतलब है, बैंक यूनियंस लगातार बैंकों के इस Merger का विरोध कर रही हैं. इसी संबंध में बैंक यूनियंस ने 26 दिसंबर को देशव्यापी हड़ताल का ऐलान किया है.



मीडिया में आई खबरों के मुताबिक वित्त मंत्रालय लगातार इन बैंकों के Merger के काम को आगे बढ़ा रहा है. गौरतलब है, सरकार 1 मार्च 2019 से नए बैंक को शुरू करने की योजना पर काम कर रही है जो देश का तीसरा सबसे बड़ा बैंक होगा.

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प्रस्तावित विलय किसी के भी हक में नहीं- UFBU

United Forum Of Bank Unions लगातार इस विलय के प्रस्ताव विरोध कर रही है. UFBU का कहना है, प्रस्तावित Merger ना तो कर्मचारियों के हित में है, और ना ही ग्राहकों के हित में.
इसी संबंध में United Forum Of Bank Unions ने 26 दिसंबर को एक दिवसीय हड़ताल का ऐलान किया है.
26 दिसंबर को प्राइवेट बैंकों के कर्मी सहित देशभर के सभी 1000000 बैंक कर्मी हड़ताल पर रहेंगे.
लेकिन इतना सब होने के बावजूद भी सरकार प्रस्तावित Merger से पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रही है. सरकार की पूरी तैयारी है. कि जरूरी प्रक्रियाओं के तहत Merger के प्रस्ताव को संसद के इसी सत्र से पारित करा लिया जाए जो कि 8 जनवरी को समाप्त हो रहा है.
कितना कारगर होगा Merger.

दरअसल इस समय सभी सरकारी बैंको की NPA के बढ़ते बोझ से साँसे फूल रहीं हैं। सरकारी स्तर पर भी बैंको के डूबे हुए कर्ज को लेकर भारी चिंता है. बैंकों को इस स्थिति से निकालना सरकार के लिए मुसीबत बनता जा रहा है. मोदी सरकार में सरकारी बैंक इतिहास के अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहें हैं. SBI जैसा बाद बैंक पिछले तीन तिमाही से लगातार घाटे में है. आपको बता दें, SBI अपने इतिहास में पहली बार घाटे में गया है. बैंको को NPA से होने वाले घाटे से उबारने के लिए सरकार कॉस्ट-कट के फार्मूले को अपनाने जा रही है. दरअसल सरकार का मानना है कि बैंको के Merger से उनकी ऑपरेशन की लागत कम हो जाएगी. और बड़ी बैंक ज्यादा जोखिम के लिए सक्षम होगी.

तबाही की वजह हैसरकारी हस्तक्षेप.


दरअसल जब से बैंको का राष्ट्रीयकरण हुआ हैतभी से सरकारी बैंकों में सरकारी हस्तक्षेप रहा है. वर्तमान सरकार के आने के बाद यह हस्तक्षेप हद से ज्यादा बढ़ गया. सरकार ने अपनी लोक-लुभावनी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए बैंको का हद से ज्यादा उपयोग किया. नतीजा यह हुआ कि बैंक अपने मूल काम डिपॉजिट और लोन को छोड़कर सरकारी एजेंट की तरह काम करने लगे। 
बैंक प्रबंधन का फोकस डिपाजिट और एडवांस के टारगेट से हटकर PMJBY, PMSBY, MUDRA Loan, PMJDY, AADHAR Centers, आदि के टारगेट हो गए. बैंको के प्रबंधन की योग्यता का आधार बैंको का बिज़नेस ना होकरसरकारी योजनाओं में पूरे किए गए टारगेट हो गए. सरकारी बैंकों में सरकारी दखल इस हद तक बढ़ गया कि बैंक कर्मी जबरदस्त तनाव में आ गए. पहले से ही काम के अधिक बोझ और कम स्टाफ का दर्द झेल रहे है बैंक कर्मियों के लिए सरकारी दबाव के आगे बैंक का मूल बिज़नेस डिपाजिट-एडवांस-लोन-रिकवरी आदि पीछे छूट गया. 


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