UFBU मे दो फाड़, क्या 21 फरवरी को होगा समझौता.? या मिलेगी एक सिर्फ नई तारीख.. .?


UFBU मे दो फाड़, क्या 21 फरवरी को होगा समझौता.? या मिलेगी एक सिर्फ नई तारीख..
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देशभर के बैंककर्मियों के विहाफ़ पर, IBA के साथ वेतन समझौते पर वार्ता करने के लिए गठित UFBU अब आपस मे ही दो-फाड़ होने लगी है। दरअसल UFBU देश की नौ बड़ी बैंक यूनियनों का एक कंबाइंड फोरम है। जो देश के सभी बैंककर्मियों के लिए IBA से वेतन समझौते पर वार्ता करती है।


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RRBNEWS:- अब खबरें रही है, UFBU आपस मे ही बँट गया है। 21 फरवरी को IBA के साथ मीटिंग होने से पहले 20 फरवरी को UBFU की मीटिंग है। सभी की नजरें अब UFBU की 20 जनवरी की मीटिंग पर टिक गई हैं। यह बैठक हंगामेदार हों सकती है। क्योंकि बैंक के कर्मचारी और अधिकारी 11th BPS पर आपस मे ही बँट चुके हैं। IBA के साथ पिछ्ली बैठक में UFBU की नौ यूनियंस में से 2 अधिकारी यूनियनों ने इससे दूरी बना ली थी। अगर जल्द ही UFBU इस संबंध में अपने आपसी मतभेद दूर नही करती तो निश्चित ही इसका असर वेतन समझौते पर पड़ेगा।



मतभेदों की वजह..

दरअसल IBA ने स्केल-4 और उससे ऊपर के अधिकारियों के लिए बैंक वाइज वेतन समझौते का प्रोपोजल रखा है। जिस पर UFBU आपस मे ही बँट गया है। बैंक की कर्मचारी और अधिकारी यूनियन एक-दूसरे के सामने गई हैं। सरकार ने सायद इसीलिए इस मुद्दे को शामिल किया है। जिससे कर्मचारियों और अधिकारियों की एकता को तोड़ा जा सके। सायद IBA की नीयत ही ठीक नही है। अगर UFBU, IBA के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता है। और स्केल-4 से ऊपर वेतन समझौता बैंक वाइज शुरू हो जाता है। तो निश्चित ही एक बेहद खराब शुरुआत होगी। और भले ही अभी इसे स्केल-4 तक लागू किया जाए। लेकिन आगे इसे सभी बैंक के सभी कैडर के लागू किया जाएगा। जो शोषण की एक नई शुरुआत होगी।

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नतीजे पर पहुँचने की उम्मीद ज्यादा

हो सकता है, 21 फरवरी को 11th bps के लिए आखिरी मीटिंग हो. क्योकि यूनियन और IBA दोनों ही लगभग साफ़ कर चुकी हैं. समझौता 13-15 % के बीच ही होगा। अब पेंच बैंक वाइज सेट्लमेंट पर फसा हुआ है. अगर UFBU, 20 फरवरी की मीटिंग में आपस में किसी समझौते पर पहुंच जाता है. तो बहुत संभव है 21 तारीख को कोई ठोस नतीजा हम सबके सामने हो. एक तरह से बैंक यूनियन IBA द्वारा फेके गए जाल में फँसती नज़र रही है. अगर 21 फरवरी या उससे बाद चुनाव तक कोई समझौता नहीं हो पाता। तो सीधे तौर पर IBA , UFBU को इसके लिए जिम्मेदार ठहरा देगा। बैसे उम्मीद कम ही है, सरकार इसे चुनाव बाद ले जाने की सोचे।
चुनावी माहौल में सरकार कभी भी देश भर के लाखों बैंक कर्मचारियों की नाराजगी नहीं लेना चाहेगी। बैसे भी पिछले पांच साल में बैंक कर्मी पूरी तरह से सरकार से तंग चुके हैं. तीन राज्यों में हार के बाद सरकार को भी अपनी विफलता का एहसास हो चुका है. अब उसका पूरा फोकस किसी भी तरह सत्ता में वापसी पर लगा हुआ है. यूनियन और बैंक कर्मियो को चाहिए, वो इस मौके का फ़ायदा उठाकर अपने लिए एक अच्छे समझौते के लिए सरकार को राजी कर सके.





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