तबाह होता बैंकिंग सेक्टर: मोदी 2.0 की सबसे बड़ी चुनौती


तबाह होता बैंकिंग सेक्टर: मोदी 2.0 की सबसे बड़ी चुनौती

17वीं लोकसभा के स्वरूप को लेकर लगाये जा रहे तमाम कयासों को खारिज करते हुए जनता ने जो जनादेश सुनाया उसकी उम्मीद खुद मोदी को भी नही थी। मोदी भय से संगठित हो चुके विरोधियों की कोई भी जुगत काम न आयी और अन्ततः नयी टीम के साथ दूसरी बार नरेन्द्र भाई मोदी ने फिर भारत के प्रधान मंत्री की कुर्सी संभाल ली। मोदी ने अपना काम शुरू कर दिया है। नयी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती वह है जिसे बीते लोकसभा चुनाव में मुद्दा बनना चाहिए था। अगर आंकड़ो पर गौर फरमाये तो पता चलता है कि बीते 45 सालों में सबसे अधिक बेरोजगारी यहां बढ़ी है।
-शिव करन द्विवेदी  (राष्ट्रीय महासचिव NFRRBE)
हद से ज्यादा बैंक फ्रॉड
भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार वित्त वर्ष 2018-19 में बैंक फ्राड के 6,800 मामले दर्ज हुए हैं और 71,500 करोड़ का चूना लगा है. उसके पहले के साल 2017-18 में 41,167 करोड़ का चूना लगा और फ्राड के 5,916 मामले दर्ज हुए हैं. विगत 11 वित्तीय वर्षों में यानी 2008 से अब तक 2 लाख करोड़ का फ्राड हो चुका है. फ्राड के 53,334 मामले दर्ज हो चुके हैं. 75 से 80 प्रतिशत फ्राड के मामले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में हुए हैं.।
तलाशना होगा बैंकिंग संकट का समाधानः 
नयी सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती बैड लोन से निबटने व बेरोजगारी, मंहगाई और भ्रष्टाचार वित्तीय सेक्टर में बने नकदी संकट को दूर करने की होगी. दिवालिया कानून (आइबीसी) के जरिये एनडीए प्रथम सरकार ने इससे निबटने का कदम उठाया था. इसका लक्ष्य 10 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के बैड लोन का समाधान निकालना था. हालांकि, अब भी बैंकों पर बैड लोन का बोझ बहुत ज्यादा है. वहीं, दिसंबर 2018 तक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां आठ ट्रिलियन रुपये से अधिक थीं. लेकिन अब वित्तीय क्षेत्र में नकदी का संकट खड़ा हो गया है, जिसका समाधान निकालना होगा. पिछले साल सितंबर में आइएल एंड एफएस के कर्ज डिफाल्ट शुरू करने के बाद यह संकट बना है. उसके ऊपर करीब 90 हजार करोड़ रुपये का कर्ज है. इसकी वजह से बहुत-सी गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां कर्ज देने में आनाकानी करने लगी हैं. व्यापार घाटा भी बढ़ता जा रहा हैअप्रैल 2019 तक भारत का व्यापार घाटा रिकॉर्ड 15.3 बिलियन डॉलर पर पहुंच गया, जबकि मार्च में यह 10.9 बिलियन डॉलर था. वहीं, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में भी कमी आ रही है. वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के आंकड़े के अनुसार, वित्त वर्ष 2019 के अप्रैल-दिसंबर माह के बीच व्यापार घाटा सात प्रतिशत की गिरावट के साथ 33.49 बिलियन डॉलर पर पहुंच गया, जबकि 2017-18 के इसी अवधि में यह 35.94 बिलयन डॉलर था. बीते कुछ समय से एफडीआइ में भी कमी आयी है. इस कमी के कारण देश के भुगतान संतुलन पर दबाव पड़ सकता है. नतीजा रुपये के मूल्य में गिरावट आ सकती है. ये वजहें महंगाई बढ़ने में सहायक होती हैं नयी वित्त मंत्री के लिए वित्त क्षेत्र की इन समस्याओं से निबटना आसान नहीं होगा.
कृषि संकट से निबटना होगा
वर्ष 2004-05 में जीडीपी में कृषि (कृषि, वानिकी और मत्स्य पालन) का हिस्सा 21 प्रतिशत था, जो बीते पंद्रह वर्षों में गिर कर 13 प्रतिशत पर आ गया है, जबकि इसकी तुलना में इस क्षेत्र में कार्यबल की संख्या में कोई कमी नहीं आयी है. देश में लगभग 55 प्रतिशत श्रमबल कृषि क्षेत्र में कार्यरत हैं अनुमानतरू 26 करोड़ लोग इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं. इस कारण देश की तकरीबन 55 से 57 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है, लेकिन सरकारी उपेक्षा के कारण इनकी स्थिति दयनीय बनी हुई हैवर्तमान में इनकी परेशानी का कारण खाद्य कीमतों में गिरावट है, जिससे उत्पादन का लागत नहीं निकल पाता और किसान कर्ज में डूबते चले जाते हैं. अंततरू वे खेती से पलायन करने या आत्महत्या करने को विवश हो जाते हैं.

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